देहरादून,। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान देहरादून द्वारा अपने रविवारीय साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम के आयोजन का शुभारम्भ दिव्य ज्योति वेद मन्दिर के वेदज्ञों द्वारा प्रस्तुत दिव्य ‘रूद्रिपाठ’ का मधुर गायन करते हुए किया गया। तत्पश्चात संस्थान के संगीतज्ञों ने अनेक सुन्दरतम भजनों को संगत के समक्ष प्रस्तुत करते हुए उन्हें भावविभोर किया गया। भजनों में छुपे हुए गूढ़ आध्यात्मिक तथ्यों की सटीक व्याख्या करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती के द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि सत्संग-प्रवचनों के बीच जो दिव्य संदेश समूची मानवता के कल्याण हेतु छुपा होता है उसे जो मनुष्य आत्मसात कर लेता है तो उसका सम्पूर्ण जीवन ईश्वरीय आभा से चमकने लगता है। मनुष्य की श्रद्धा इसमें प्रमुख भूमिका निभाया करती है। महाभारत के समरांगण में जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का ज्ञान प्रदान किया गया तो अर्जुन का तो मोह भंग हो गया लेकिन जब दूसरी ओर इसी ज्ञान को दिव्य दृष्टि प्राप्त संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सुनाया गया तो उनके पुत्रमोह में तनिक भी कमी नहीं आई। यही है जिसके संबंध में महापुरूष कहते हैं- ‘‘श्रद्धावानम लभ्यतेज्ञानम’’।
आज के कार्यक्रम में प्रवचन करते हुए साध्वी विदुषी सुभाषा भारती ने बताया कि गुरू के ज्ञान के बिना भवसागर से पार होना असम्भव है। चाहे ब्रह्मा जितनी सृष्टि के निर्माण की शक्ति भी प्राप्त कर ले, भगवान शिव की तरह विनाश करने की शक्ति ही क्यों न पा ले, तब भी बिना पूर्ण गुरू के उसकी मुक्ति सर्वथा असम्भव बात है। साध्वी जी ने श्री गुरू तेग बहादुर जी से संबंधित प्रेरक दृष्टांत भी संगत के समक्ष रखते हुए कहा कि गुरू तथा ईश्वर में कोई भेद नहीं है, दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हुआ करते हैं पूर्ण गुरू सृष्टि में इसलिए अवतार धारण करते हैं ताकि वे अपने सनातन पावन ‘‘ब्रह्मज्ञान’’ के द्वारा जनसमाज़ को ईश्वर का दर्शन तथा उनकी प्राप्ति करवा पाऐं, चैरासी लाख योनियों के चक्र से उन्हें मुक्त कर सकें।
कार्यक्रम में सदगुरू आशुतोष महाराज की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की संयोजक साध्वी विदुषी अरूणिमा भारती ने भी संगत को सम्बोधित करते हुए कहा कि दिव्य गुरू की महिमा अपरम्पार है दिव्य से तात्पर्य होता है अलौकिक। गुरू अपने शिष्य को भी अपनी दिव्यता के पावन रंग में रंगकर उसे दिव्य बना दिया करते हैं। उन्होंने महाभारत के काल की उस घटना का जिक्र किया जिसमें द्रौपदी द्वारा सन्त मिलन की ओर बढ़ते कदमों की कोटि यज्ञों की तरह बताते हुए इसे परम सौभाग्य का सूचक बताया था। पूर्ण गुरू की दिव्य महिमा को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि इसके समक्ष तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी गौण हो जाता है। साध्वी जी ने कहा कि गुरू तो सदा अपने शरणागत का परम कल्याण ही किया करते हैं क्योंकि ‘अहैतुकी कृपा’ करना उनका स्वभाव हुआ करता है। शिष्य को भी अपने भीतर के समस्त दोषों जैसे ईष्र्या, द्वेष, नफरत इत्यादि को त्यागते हुए गुरू भक्ति के महान मार्ग पर निरन्तर चलते रहना चाहिए तभी वह गुरू के माध्यम से अपने मानव जीवन के परम लक्ष्य, ईश्वर की प्राप्ति कर पाऐगा। उन्होंने साधकों को ‘स्वाध्याय’ करते रहने पर फिर एक बार जोर देते हुए कहा कि इससे भक्त साधक अपना सटीक विश्लेषण कर पाता है।
माह का दूसरा रविवार होने पर कार्यक्रम में भण्डारे का भी आयोजन किया गया।

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