window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'UA-96526631-1'); एम. मुरुगानंदम ने आईसीएआर-सीआईएआरआई पोर्ट ब्लेयर में ग्रहण किया कार्यभार | T-Bharat
January 29, 2026

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एम. मुरुगानंदम ने आईसीएआर-सीआईएआरआई पोर्ट ब्लेयर में ग्रहण किया कार्यभार

 

देहरादून,। डॉ. एम. मुरुगानंदम, प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी (पीएमई एवं ज्ञान प्रबंधन इकाई), आईसीएआर भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईसीएआर आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून ने आईसीएआर केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईएआरआई), पोर्ट ब्लेयर में मत्स्य विज्ञान प्रभाग के प्रमुख के रूप में कार्यभार ग्रहण किया है। उनका यह पदभार ग्रहण एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता हैकृउत्तराखंड के हिमालयी कृषि पारितंत्रों से अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह तथा बंगाल की खाड़ी के नाजुक द्वीपीय एवं तटीय पारितंत्रों तककृजिसके साथ लगभग तीन दशकों का समृद्ध वैज्ञानिक, संस्थागत एवं समुदाय-केंद्रित अनुभव जुड़ा हुआ है।
डॉ. मुरुगानंदम ने वर्ष 1996 में आईसीएआर में एक युवा वैज्ञानिक के रूप में अपना करियर आरंभ किया था और समय के साथ वे एक प्रतिष्ठित शोधकर्ता, संस्थान-निर्माता तथा विज्ञान संप्रेषक के रूप में विकसित हुए। आईसीएआरदृआईआईएसडब्ल्यूसी में लगभग 30 वर्षों के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, मत्स्य एवं पशुपालन आधारित आजीविका, जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन तथा पारितंत्रीय लचीलापन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया, जिसमें लोगों की भागीदारी और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण को विशेष महत्व दिया गया।
उन्होंने जलग्रहण प्रबंधन ढांचे के अंतर्गत मत्स्य, जलीय कृषि तथा पशुधन आधारित सूक्ष्म उद्यमों के एकीकरण में अग्रणी भूमिका निभाई। साथ ही, आईआईएसडब्ल्यूसी में जलग्रहण आधारित मत्स्य अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन सुविधाओं की स्थापना कर मृदा एवं जल संरक्षण कार्यक्रमों में मत्स्य एवं संबद्ध क्षेत्रों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके प्रयासों से मत्स्य एवं पशुपालन आधारित दस से अधिक उत्पादन प्रौद्योगिकियों एवं आजीविका मॉडलों का विकास एवं परिष्करण हुआ, जिससे जनजातीय समुदायों, संसाधन-विहीन परिवारों, महिला किसानों तथा भूमिहीन वर्गों को प्रत्यक्ष लाभ मिला।
डॉ. मुरुगानंदम की अनुसंधान एवं विस्तार गतिविधियों से दस लाख से अधिक हितधारक लाभान्वित हुए हैं। उनके कार्यों ने स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, पारंपरिक मत्स्य पालन प्रथाओं, नदी संसाधन शासन, जैव विविधता संरक्षण तथा सामुदायिक पारितंत्र संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नदियों, आद्र्रभूमियों तथा जलीय जैव विविधता के सतत प्रबंधन के प्रति समुदायों और सरकारी एजेंसियों दोनों को संवेदनशील बनाने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है।
वर्ष 2016 से 2018 के दौरान, संयुक्त राज्य अमेरिका के साउथ डकोटा स्टेट यूनिवर्सिटी में विजिटिंग साइंटिस्ट के रूप में उन्होंने भूमि उपयोग एवं भूमि आवरण परिवर्तन के आद्र्रभूमियों और जल गुणवत्ता पर प्रभावों का उन्नत भू-स्थानिक विश्लेषण किया, जिससे उनके वैज्ञानिक प्रोफाइल को अंतरराष्ट्रीय एवं अंतर्विषयक आयाम मिला।
अनुसंधान के साथ-साथ डॉ. मुरुगानंदम ने नेतृत्व, प्रशासन और संस्थागत विकास में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने आईसीएआरदृआईआईएसडब्ल्यूसी में सतर्कता अधिकारी, जांच अधिकारी, प्रेस एवं मीडिया नोडल अधिकारी, आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) के सदस्य, डिजिटल आउटरीच के अध्यक्ष तथा पीएमई एवं ज्ञान प्रबंधन इकाई के प्रभारी जैसे दायित्व निभाए। उन्होंने लगभग 25 राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और परामर्श बैठकों का समन्वय किया, 100 से अधिक वैज्ञानिक मंचों में भाग लिया तथा प्रतिष्ठित फुलब्राइट फेलोशिप सहित 30 से अधिक फेलोशिप, पुरस्कार एवं अनुदान प्राप्त किए।

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