window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'UA-96526631-1'); फूलों और गोबर से गढ़ी आत्मनिर्भरता की नई मिसाल | T-Bharat
January 29, 2026

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फूलों और गोबर से गढ़ी आत्मनिर्भरता की नई मिसाल

हरिद्वार,। ग्राम विकास की धारा में जब परंपरा और नवाचार का संगम होता है, तब जन्म लेती है आत्मनिर्भरता की सच्ची मिसाल। विकासखंड बहादराबाद के सरस केंद्र, जमालपुर कलां में यही कहानी साकार कर रही हैं महिलाओं के स्वयं सहायता समूह कृ जिन्होंने आईटीसी मिशन सुनहरा कल, श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम, ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना तथा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (छत्स्ड) के सहयोग से अपने कौशल को आजीविका में बदल दिया है।
फूलों से धूप, गोबर से दिए  सृजन और स्वच्छता का संगमः मंदिरों से प्रतिदिन निकलने वाले निर्माल्य (फूल-पत्तियों) और गाय के गोबर को महिलाएं अब कचरा नहीं, बल्कि संसाधन मानकर उसे नए जीवन में बदल रही हैं।
फूलों से सुगंधित धूपबत्तियां और अगरबत्तियां, गोबर और मिट्टी से निर्मित पर्यावरण-मित्र दिये, और पुनर्चक्रित सामग्री से बनी ऐंपण पूजा थालियां और सजावटी वस्तुएं,इन सबने सरस केंद्र को इस दीपावली स्वदेशी सृजन का केंद्र बना दिया है। मंदिरों से एकत्रित फूलों को सहकारिता द्वारा घ्5 प्रति किलो (ताजे) और 50 प्रति किलो (सूखे) की दर पर खरीदा जाता है। इन्हें सुखाकर, प्रसंस्कृत कर धूप-अगरबत्ती के रूप में पुनः जीवन दिया जाता है कृ जिससे स्वच्छता भी बढ़ती है और आय भी सृजित होती है।
ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना और आजीविका मिशन का संगठित प्रयासः इस पहल को ग्रामोत्थान परियोजना के माध्यम से तकनीकी सहयोग प्राप्त है, जबकि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने समूहों को प्रशिक्षण, बैंक लोन और विपणन सहायता प्रदान की है। आईटीसी मिशन सुनहरा कल के अंतर्गत मंदिरों को फ्लावर मैनेजमेंट प्रणाली से जोड़ा गया है, जहां से एकत्रित फूल सीधे जमालपुर कला के सरस केंद्र तक पहुंचाए जाते हैं।
इस गतिविधि के माध्यम से सहकारिता ने 8 से 10 लाख रुपये तक के वार्षिक व्यवसाय का लक्ष्य रखा है। “लोकल से वोकल” की दिशा में सशक्त कदम सहकारिता अध्यक्ष विमल जोशी कहती हैं “बाजार में स्वदेशी, प्राकृतिक और पारंपरिक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। हमारे उत्पाद न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी लोगों को मंदिरों और परंपरा से जोड़ते हैं।” बबली देवी पाल, जो आश्रम की कार्यकर्ता और समूह की सदस्य हैं, बताती हैं “पहले गोबर केवल खाद के रूप में इस्तेमाल होता था, पर अब वही हमारे लिए आय का साधन बन गया है। मंदिरों के फूलों का पुनः उपयोग कर हमने स्वच्छता, सम्मान और रोजगार तीनों को एक सूत्र में पिरोया है।”
रचनात्मकता, सौंदर्य और संस्कृति का संगमः समूह की महिलाएं पुराने बर्तनों और पेपर प्लेट्स को रंगों व कलात्मक चित्रकारी से सजाकर आकर्षक रंगोली पूजा थालियां तैयार कर रही हैं। इन थालियों की मांग स्थानीय बाजारों में इतनी बढ़ी है कि सहकारिता को अग्रिम ऑर्डर प्राप्त हो रहे हैं।
डॉ. पंत, परियोजना प्रबंधक, श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम, ने कहा “फूलों और गोबर आधारित इकाइयों की स्थापना ने गांवों में स्वरोजगार का नया द्वार खोला है। इससे न केवल महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामोत्थान कृ तीनों दिशा में ठोस प्रगति हुई है।
हमारा उद्देश्य है कि हर महिला ‘लोकल से वोकल’ बने, स्वदेशी अपनाए और अपने गांव को आर्थिक रूप से समृद्ध करे।” एक दीप आत्मनिर्भरता का कृ जमालपुर कला से जगमग भारत की ओर। जमालपुर कला का यह सरस केंद्र आज ग्रामीण नवाचार, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण का प्रेरणादायक केंद्र बन चुका है। आईटीसी मिशन सुनहरा कल, ग्रामोत्थान परियोजना और भुवनेश्वरी महिला आश्रम के सहयोग से यहां की महिलाएं इस दीपावली न केवल दीप जला रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और सशक्त भारत का उजाला फैला रही हैं।

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