window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'UA-96526631-1'); दिव्य भजन संध्या कार्यक्रम में जीवन में पूर्ण सतगुरु की परम आवश्यकता पर बल दिया गया | T-Bharat
January 29, 2026

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दिव्य भजन संध्या कार्यक्रम में जीवन में पूर्ण सतगुरु की परम आवश्यकता पर बल दिया गया

देहरादून,। विश्व के सबसे बड़े मानव समागम, महाकुंभ मेला 2025, श्रद्धालुओं को आत्मिक-शुद्धिकरण व आध्यात्मिक उत्थान का जीवन परिवर्तक अवसर प्रदान करता है। भक्तों के बीच दिव्य ज्ञान की शाश्वत विधि का प्रसार करने के लिए दिव्य गुरु आशुतोष महाराज की कृपा से दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा डीजेजेएस शिविर स्थल, कुंभ मेला, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में भव्य भजन संध्या का आयोजन किया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भक्तों को भक्ति का वास्तविक अर्थ और जीवन में पूर्ण गुरु के महत्व को समझाना था।
विशिष्ट अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन समारोह के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। हजारों श्रद्धालु एवं आगंतुक इस आध्यात्मिक संध्या के साक्षी बने और भगवान के चरणों में श्रद्धा व प्रार्थना अर्पित कर आंतरिक शुद्धता एवं आत्मिक उत्थान की कामना कर अनुग्रहीत हुए।
कार्यक्रम की प्रमुख वक्ता, साध्वी मणिमाला भारती ने जीवन में पूर्ण गुरु की परम आवश्यकता को सुंदर ढंग से व्यक्त किया। शास्त्रों के आधार पर उन्होंने बताया कि समस्त भौतिक उपलब्धियाँ निरर्थक हैं यदि जीवन में पूर्ण गुरु का मार्गदर्शन न हो। केवल एक पूर्ण गुरु की दिव्य कृपा से ही मनुष्य धर्म, आत्मज्ञान और मोक्ष के मार्ग को प्राप्त कर सकता है। एक सच्चा गुरु अपने शिष्य को दिव्य ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) प्रदान करता है और उसके ‘तीसरे नेत्र’ (आज्ञा चक्र) को जागृत करता है, जिससे शिष्य अपने भीतर ईश्वर का दर्शन कर सकता है। तीसरे नेत्र पर निरंतर ध्यान मानव मन, विचारों और दृष्टिकोण को आध्यात्मिक रूप से परिवर्तित करता है, जो अंततः उसके व्यवहार और कर्मों में सकारात्मक बदलाव लाता है, और अंत में एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
भावपूर्ण भजन श्रृंखला, प्रेरणादायक शब्दों और हृदयस्पर्शी धुनों के साथ, इस आयोजन ने दर्शकों को यह महसूस कराया कि सच्ची भक्ति (भक्ति योग) तभी आरंभ होती है जब मनुष्य स्वयं ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है। इतिहास में दर्ज भक्तिमती मीरा बाई, भक्तिमती शबरी, भक्त हनुमान, भक्त भरत, भक्त केवट आदि सभी ने पहले पूर्ण गुरु की कृपा से भगवान के तत्वरूप का साक्षात्कार किया और तभी वे भगवान श्रीराम अथवा श्रीकृष्ण की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन हो सके।

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